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बाई की बेटी क्या बनेगी?

PUBLISHED : Oct 19 , 7:28 AM

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्यों बन रही हैं निल बटे सन्नाटा

 

 

मसान और पिंक जैसी फिल्में


"इंजिनियर का बेटा इंजिनियर बनता है, डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है तो बाई की बेटी क्या बनेगी?" सवाल दिलचस्प है ना? इसी सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करती हाल ही आईं नई फिल्म"निल बटे सन्नाटा","मसान" और "पिंक " पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व रामभाऊ म्हालगी प्रबोधनी मुंबई के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने

भोपाल।  2014 के चुनाव के बाद देश में उम्मीदों और सपनों का एक नया वातावरण बना है। कौन किसका बेटा है, इन बातों पर ध्यान देने के बजाए युवा इसके बारे में सोच रहा है कि कौन क्या कर रहा है। यही कारण है कि देश में निल बटे सन्नाटा, मसान और पिंक जैसी फिल्में आई। युवाओं की सोच में आए बदलाव पर यह बात भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व रामभाऊ म्हालगी प्रबोधनी मुंबई के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने कही। श्री सहस्त्रबुद्धे होटल पलाश में "लोकमंथन : औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति विषय" पर मीडिया विमर्श में बोल रहे थे। 

उन्होंने कहा पहचान की राजनीति के बजाए आज का युवा पॉलीटिकल परफॉर्मेंस की ओर बढ़ रहा है। युवाओं की सोच में आ रहे बदलाव का नतीजा है कि महाराष्ट्र में अब दलित साहित्यकार अपने संघर्ष को भी उजागर कर रहा है। उन्होंने कहा आज के युवा को भ्रष्टाचार से परहेज है। युवाओं की सोच में सुस्पष्टता है और वह स्वांग से नफरत करता है। हम सांस्कृतिक राष्ट्र हैं, इसीलिए राष्ट्रीयता दिखती है। श्रेष्ठ भारत बनाना है तो एक भारत बनाना होगा।

आगामी 12 से 14 नवंबर के बीच भोपाल में साहित्य, कला व सामाजिक विषयाें पर विमर्श के लिए होने जा रहे लोकमंथन की सहस्त्रबुद्धे ने जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि 2014 के चुनाव के बाद देश में नया वातावरण बना है। यह बदलाव महज एक दल का जाना और दूसरे का आना भर नहीं था। बल्कि एक नई सोच है जो लाेगों के सामने आ रही है। लोग परिवर्तन के लिए उत्सुक थे। सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि सभी को नकारने वालों से भी तुलना करें तो, भारत अलग सोचता है। देश के सामने इस समय उद्देश्यहीनता, असलियत, स्वामित्व और संबंधों के संकट की चुनौती है। मीडिया विमर्श में लोकमंथन आयोजन समिति के सचिव जे. नंदकुमार और संस्कृति मंत्री सुरेंद्र पटवा मौजूद थे।